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सौभाग्य सुन्दर नवपद महोत्सव का हुआ मंगल शुभारंभ

प्रधान संपादक रूपचंद मेवाड़ा सुमेरपुर

भैरू चोक- सुमेरपुर

जैनाचार्य श्रीमद् विजय रत्नसेन सूरीश्वासी म. सा. की शुभ निश्रा में श्री वासुपूज्य श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ-भैंरु चौक- सुमेरपुर की धन्यधरा पर मातुश्री सुन्दरबेन दिनेश भाई रतनपुरा चौहान – सौभाग्य सुन्दर परिवार की ओर से चैत्र मास की शाश्वती नवपद ओली के शुभ अवसर पर सौभाव्य सुन्दर नवपद महोत्सव का आज से मंगल शुभारंभ हुआ।

प्रात: 9:00 बजे गाजे-बाजे के साथ जैनाचार्य एवं सभी आराधकों का गुलाब पौषधशाला से प्रयाण हुआ। हवाला गली में निर्मित चंपापुरी नगरी का उद् घाटन जैनाचार्य का आशीर्वाद लेकर जितेन्द्र भाई चौहान ने किया। फिर धर्मसभा का आयोजन हुआ। मंगलाचरण के बाद संगीतकार उमेशभाई ने गुरुभक्ति गीत प्रश्तुत किया। फिर मु. श्री स्थूलभद्र विजय जी ने श्रीपाल महाराजा के चरित्र पर‌ प्रवचन दिया। फिर जैन हिन्दी साहित्य दिवाकर जैनाचार्य श्री रत्नसेन सूरीश्वरजी ने धर्मसभा में अरिहंत आदि नवपदों का महत्त्व समझाते हुए प्रवचन में कहा कि-

चार गति रूप इस संसार में सर्वत्र समस्याएँ रही हुई है। इन समस्त समस्याओं का अंत एक मात्र मोक्ष में है। जगत् के जीवों को समस्त समस्याओं से मुक्त करने की शुभ भावना से जिन्होंने स्वयं पूर्णता प्राप्त की एवं मोक्ष का मार्ग बताया ऐसे अरिहंत परमात्मा इस जगत् के सबसे बडे उपकारी है।.

प्यासे को पानी पिलाने से प्यास की समस्या हल होती है परंतु कुछ देर बाद पुनः प्यास लगती है। भूखे को भोजन देने से भूख की समस्या हल होती है परंतु दूसरे दिन पुनः भूख लग जाती है। वस्त्र रहित को वस्त्र  देने से वस्त्र की समस्या हल होती है परंतु कुछ दिनों में वस्त्र भी फट जाता है।.

संसार की सभी समस्याओं का एक समाधान अल्प कालीन है। फिर भी उन समस्याओं का समाधान देने वालों को हम उपकारी मानते है। परंतु अरिहंतो से बढ़कर कोई बडा उपकारी नहीं है क्योंकि वे जगत् की क्षणिक समस्याओं का नहीं बल्कि सभी समस्याओं का शाश्वत समाधान देते है।

अरिहंत कोई व्यक्ति विशेष नहीं है बल्कि एक विशिष्ट पदवी है। संसारी जीवों को मोहाधीन जानकर उनके कल्याण के लिए अपने पूर्व के तीसरे भव में सभी जीवों को शाश्वत सुखी’ बनाने की तीव्र शुभ भावना के बल से ‘तीर्थकर नाम कर्म रूपी सर्वोच्च पुण्य का उपार्जन करते है। इस पुण्य के प्रभाव से उनके अंतिम भव में उनके च्यवन, जन्म, दीक्षा, केवलज्ञान और निर्वाण की घटनाओं को कल्याणक कहा जाता है।

नमस्कार महामंत्र और नवपदों में सबसे पहले हम ‘नमो अरिहंताण पद से अरिहंतों को नमस्कार करते है। इसका कारण उनका इस जगत् पर महान और असीम उपकार है। वे मोक्ष मार्ग के आद्य प्रकाशक है।.
भौतिक सुखों की सर्वोच्च समृद्धि के बीच जन्म लेने पर भी जन्म से ही विरक्त तीर्थकर परमात्मा दीक्षा लेने से पहले जगत की द्रव्य दरिद्रता को दूर करने वार्षिक दान देते हैं। प्रतिदिन १ करोड 8 लाख सुवर्ण मुद्राए प्रमाण वर्ष भर तक दान देते हैं।
दीक्षा लेने के बाद सभी जीवों को अभयदान देते है एवं साधना के बल पर केवलज्ञान प्राप्त करके वे जगत् की भाव दरिद्रता को दूर करने के लिए धर्म तीर्थ की स्थापना करते है।
तीर्थ की स्थापना के बाद प्रतिदिन अरिहंत परमात्मा भव्य जीवों के कल्याण के लिए दो प्रहर तक धर्मदेशना देते है। इस धर्म देशना के अमीपान से अनेक भव्यात्माएँ मुक्तिपद प्राप्त करते है।
अरिहंत परमात्मा के तीर्थकर नाम कर्म के प्रभात से सभी 64 इन्द्र एवं देवी-देवता अरिहंतो के आगे नतमस्तक रहते है। केवलज्ञान की प्राप्ति के बाद कम से कम एक करोड देवता उनकी सेवा-भक्ति में तत्पर रहते है।.
अरिहंतों के विशिष्ठ आठ प्रातिहार्य और चार अतिशयों से युक्त बारह गुण होते है। उनकी विशेष भक्ति अपनी आत्मा के कर्म बंधनों से मुक्ति प्रदायी बनती है।
दोपहर 2:30 बजे ऋषभ कथा का कार्यक्रम हुआ। शाम 8:00 बजे बाल कलाकर सिध्दार्थ मुधा ने प्रभु भक्ति की समझट मचाई। दि. २७ मार्च को सिद्ध पद की आराधना होगी । ‘नमो सिद्धाण” पद की की २० मालाए, 8 स्वस्तिक, 8 खमासमण, 8, प्रदक्षिणा के द्वारा आराधना होगी। दोपहर 2 बजे अठारह पापस्थानक निवारण संगीतमय संवेदना युक्त कार्यक्रम होगा!

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