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आगम शास्त्रों की परम्परा को अविच्छिन्न रखते है- उपाध्याय भगवंत “

प्रधान संपादक रूपचंद मेवाड़ा सुमेरपुर

सुमेरपुर जैनाचार्य श्री रत्नसेन सूरीश्वरजी की शुभनिश्रा में श्री वासुपूज्य स्वामी श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ – भैरु चौक- सुमेरपुर की धन्यधरा पर -मातुश्री सुन्दरबेन दिनेशभाई रतनपुरा चौहान – सौभाग्य सुन्दर परिवार की ओर से चैत्रमास की शाश्वती नवपद ओली निमित्त आयोजित ‘सौभाग्य सुन्दर नवपद महोत्सव के चौथे दिन धर्मसभा मे उपाध्याय पद की महिमा समझाते हुए प्रवचन दरम्यान जैनाचार्यश्री ने कहा कि नवपद की आराधना के केन्द्र में रहे पंच परमेष्ठी, धर्म रूपी कल्पवृक्ष के विभिन्न अंग है। वृक्ष का मूल उसकी जड होती है वैसे ही धर्म का मूल अरिहंत पद है। जड़ का वर्ण सफेद होता है, वैसे ही अरिहंत पद का ध्यान सफेद वर्ण से किया जाता है।

धर्म की आराधना का फल मोक्ष की प्राप्ति है अतः सिद्धपद फल के स्थान पर है। सामान्य से फल का वर्ण लाल होता है, वैसे ही सिद्ध पद का ध्यान लाल वर्ण से किया जाता है।.

आचार्य पद फूल के समान है। फूल की महेक सभी को आकर्षित करती है वैसे ही आचार्य भगवत अपने सदाचार की महेक से धर्मश्रद्धालुओं को आकर्षित करते है। सामान्य से फूलों का वर्ण पिला होता है, वैसे ही आचार्य पद का ध्यान पीले वर्ण से किया जाता है।

वृक्ष की सुन्दरता उसके हरे-भरे पत्तों से होती है। वैसे ही धर्म रूपी वृक्ष की सुंदरता का कारण उपाध्याय पद है। उनका ध्यान हरे रंग से किया जाता है।एवं वृक्ष का आधार उसका स्तंम होता है वैसे ही धर्म का आधार साधुपद हैं । सामान्य से स्तंभ काले वर्ण का होता है वैसे ही साधुपद का ध्यान काले वर्ण से किया जाता है।   पत्तों के स्थान पर रहे उपाध्याय भगवंतो का अत्याधिक महत्त्व है आचार्य भगवंतों से प्रतिबोध पाकर दीक्षित बने साधु के योगक्षेम की जिम्मेदारी उपाध्याय भगवंतों की होती है।

पध्याय भगवंत विनय गुण के भण्डार होते है।मोक्षमार्ग की साधना के लिए विनयगुण अनिवार्य है। उपाध्याय भगवंत स्वयं 11 अंग तथा 12 उपांग के ज्ञाता होते है, फिर भी वे आचार्य भगवंत का विनय करते हुए श्रेष्ठ आदर्श प्रस्तुत करते है।

आश्रित मुनिवरों को शास्त्र तथा आगमों का ज्ञान देना उपाध्याय भगवंतों का मुख्य कार्य है। ज्ञानदान के द्‌वारा वे शासन की परम्परा को चलाने में अपना अपूर्व सहयोग देते हैं।

तीर्थ कर परमात्मा के विरह में उनके वचन स्वरूप आगम शास्त्र भव्य जीवों के लिए परम आधारभूत है। कुशल शिल्पी की तरह उपाध्याय भगवंत जड बुद्धि वाले शिष्य को भी अपनी शिक्षण कला के द्वारा आगम शास्त्रों का बोधदेकर आगम शास्त्र की परम्परा को अविच्छिन्न रखते है।

दोपहर 2:30 बजे शत्रुंजय और गिरनार महातीर्थ की भावयात्रा हुई। इस निमित पंडाल में 20 फिट लंबी-चौडी रंगोली एवं फूलों की सजावट है की गई। सुरत से पधारे मोंटूभाई जैन ने संवेदना प्रस्तुत की।

शाम 8:00 बजे दिलीप बाफना ने भक्ति संगीत की समझर मचाई। दि. 29 मार्च को प्रातः 9:00 बजे प्रवचन एवं दोपहर 2:30 बजे संयम संवेदना के साथ जैनाचार्यश्री द्वारा अलिखित 271 एवं 272 वी पुस्तक हृदय प्रदीप भाग 1-2 का भव्य विमोचन होगा ।

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