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सुमेरपुर में हुआ दो जैनाचायोॅ का स्नेह मिलन       

प्रधान संपादक रूपचंद मेवाड़ा सुमेरपुर

श्री वासुपूज्य स्वामी श्वेताम्बर मूर्तिपुजक जैन संघ भैरू चौक -सुमेरपुर में मरूधर रत्न जैनाचार्य श्री रत्नाकर सूरीश्वरजी का आगमन हुआ ।श्रीसंघ में विराजित जैनाचार्यश्री रत्नसेन सूरीश्वरजी एवं जैनाचार्य श्री रत्नाकर सूरीश्वरजी का स्नेह मिलन हुआ । जवाई काम्बा होटल से महेस बेन्ड -सुमेरपुर एवं स्थानीक ढोल की रमझट के साथ श्रीसंघ ने हार्दिक स्वागत किया।

गुलाब पौषधशाला में आयोजित धर्मसभा में प्रवचन देते हुए जैनाचार्यश्री रत्नसेन सूरीश्वरजी ने कहा कि मात्र एक हमारे जीवन के उपर हम पर अनेकों का उपकार रहा हुआ है । जन्मदात्री माता एवं जीवन दाता पिता का हमपर जो उपकार किये है, उसका प्रत्युपकार करने की हमारी कोई ताकत नहीं है। अपनी चंडी के जूते बनाकर भी यदि माता -पिता को पहनाया जाय,तो भी उनके उपकार को चुकाया नहीं जा सकता है।

माता-पिता के उपकार से भी बडा उपकार सद्गुरु का है। माता-पिता का उपकार तो मात्र एक जीवन तक सीमीत है, परंतु सद्गुरु का उपकार तो भवोभव का है। आत्मा के भीतर रहे अज्ञान के अंधकार को दूर करने का कार्य सद्गुरु भगवंत करते है।

बाहर का अंधेरे को दूर करना अथवा बाहर के शत्रुओं की पहिचान करना खूब आसान है। आत्मा के भीतर रहे अज्ञान के अंधेरे को दूर करना और बाहर के शत्रुओं को पहिचान करना अत्यंत कठिनहै। इस कठिन कार्य को दूर करने का कार्य सद्गुरु ही करते है।

करोडों जन्मों तक सद्गुरु की सभी प्रकार से सेवा -भक्ति करने पर भी उनका जो उपकार है वह चुकाया नहीं जा सकता है।

फिर धर्मसभा में प्रवचन देते हुए जैनाचार्य श्री रत्नाकर सूरीश्वरजी ने कहा कि-

हमारे जीवन में कर्मबंधन के पीछे के मुख्य तीन कारण है -(1) अज्ञानता (2) अविवेक और (3)अविरति ।

अज्ञानता के कारण होने वाली हमारी जो भी धर्म क्रियाएं है वे मात्र काया के स्तर पर ही रह जाती है। अविवेक के कारण बहुमान भाव एवं सद् भाव पैदा नहीं हो पाता है। अविरति के कारण पापों का त्याग नहीं हो पाता है।

मंदिर में जाकर मात्र प्रभु को हाथ जोडना यथाशक्ति कुछ अर्पन करना ,नमन -वंदन करना मात्र प्रभु से मिलन के समान है। जबकि प्रभु के गुणों में एकरस होना, अपने दोषों का नाश और प्रभु के गुणों की प्राप्ती में प्रयत्नशील होना वह प्रभु के दर्शन पाने का बडा कार्य है। प्रभु से मात्र मिलना आसान है प्रभुनके दर्शन की प्राप्ति कठिन कार्य है।

प्रतिदिन प्रात: 9:15 बजे जैनाचार्य श्री रत्नसेन सूरीश्वरजी के प्रेरणादायी प्रवचन होगे।

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